Thursday, March 6, 2014

"Appreciation Certificate" "DELHI INTERNATIONAL FILM FESTIVAL" IN DEC 2013

"Appreciation Certificate" to Seema Gupta in  Poet of the Year (India) for Outstanding Contribution as a participant in Poetry Event in "DELHI INTERNATIONAL FILM FESTIVAL" IN DEC 2013

Sunday, January 19, 2014

Ghazal Published in अनहद कृति" 25th December 2013

Ghazal Published in Literary Magazine 'अनहद कृति"
Edition 25th December 2013 

अच्छा -अच्छा हो सब कुछ दुआ कीजिये ,
कोई दिल न दुखे प्रार्थना कीजिये । 

उम्र भर की खताओं को बख्शिश मिले
एक सजदा तो ऐसा अदा कीजिये । 

कोइ दुश्मन नहीं दोस्त हैं सब यहाँ ,
जितना मुम्किन हो सबका भला कीजिये । 

कितने भगवान् हैं एक सर के लिए ,
पत्थरों को कहाँ तक खुदा कीजिये 

कौन है बेवफ़ा , बावफ़ा कौन है ,
सामने बैठकर फैसला कीजिये । 

रौशनी मेरी आँखों को देता है जो ,
उसको नज़रों से कैसे जुदा कीजिये । 

क़ैद अपने में *सीमा * न हो जाइये 
चार लोगों में बैठा - उठा कीजिये ।

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Acha acha ho sab kuch dua kijiye
Koi dil na dukhe prarthana kijiye
Umar bhar ki khatao'n ko bakshish mile
Ek sajda to aisa ada kijiye
Koi dushman nahi dost hain sab yahan
Jitna mumkin ho sabka bhala kijiye
Kiitne bhagwan hain ek sar ke liye
Pathron ko kahan tak khuda kijiye
Kaun hai bewafa , bawafa kaun hai
Saamne baith kar faisla kijiye
Roshni meri aankho'n ko deta hai jo
Usko nazro'n se kaise juda kijiye
Qaid apne mein "Seema" na ho jaiye
Char logo'nn mein baitha utha kijiye 

"दिसम्बर बहता है " urdu literary magazine "Taryaq " Dec 2013"

" Poetry Published in one of famous urdu literary magazine "Taryaq " Dec 2013"

"दिसम्बर बहता है " 
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दश्त-ए -दर्द के मंज़र 
खुश्क हवाओं के लश्कर
ज़र्द पत्तों की आहट
रगे लहू मौसम मौसम
दिसम्बर बहता है .....
बिखरते हैं
नर्म हथेलियों पे शबनम की तरह
तुम्हारे लम्स के सराब
दहकते हैं पलाश
मेरे माज़ी में गये दिनों की तरह
दिसम्बर रहता है ...........
शाम की शफक उदासी बैचेनी
है वो कौन जो ढूँढता है मुझे
अब भी तू नहीं , तब भी तू नहीं
दिसम्बर कहता है ..........
बहती नदिया के उस पार
खुश्क पत्ते , सराबोर रूहें
इश्क की मुन्तजिर आँखों में
अश्कों की तरह धीरे धीरे
दिसम्बर बहता है ...........

"दिसम्बर बहता है " Published in 'अनहद कृति" 25th December 2013

Poetry Published in Literary Magazine 'अनहद कृति"
Edition 25th December 2013 
"दिसम्बर बहता है " 

"दिसम्बर बहता है " 
----------------------
दश्त-ए -दर्द के मंज़र 
खुश्क हवाओं के लश्कर
ज़र्द पत्तों की आहट
रगे लहू मौसम मौसम
दिसम्बर बहता है .....
बिखरते हैं
नर्म हथेलियों पे शबनम की तरह
तुम्हारे लम्स के सराब
दहकते हैं पलाश
मेरे माज़ी में गये दिनों की तरह
दिसम्बर रहता है ...........
शाम की शफक उदासी बैचेनी
है वो कौन जो ढूँढता है मुझे
अब भी तू नहीं , तब भी तू नहीं
दिसम्बर कहता है ..........
बहती नदिया के उस पार
खुश्क पत्ते , सराबोर रूहें
इश्क की मुन्तजिर आँखों में
अश्कों की तरह धीरे धीरे
दिसम्बर बहता है ...........

"DECEMBER BEHTA HAI "
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Dasht-e-Dard ke manzar
Khushk hawaon ke lashkar
zard patton ki aahat
rag-e-laho mosam mosam
December behta hai .........
bikharte hain
narm hatheli pe shabnam ki tarah
tumhare lams ke saraab
dehakte hain palash
mere mazi mein gayay dino ki tarah
December rehta hai ................
shaam ki shafaq udasi bechaini
hai woh koun jo dhoondtha hai mujhay
Ab bhi tu nahee, tab bhi tu nahee........
December kehta hai.............
behti nadiya ke uos paar
kushk pattay sharaboor roohain
Ishq jo muntazir ankhon mein
ashkon ki tarah dhire dhire
December behta hai........
...........

Friday, December 13, 2013

"शुभकामना सन्देश" उत्कर्ष मेल

"शुभकामना सन्देश"


उत्कर्ष मेल सिफ एक साधारण अखबार न होकर , एक अत्यंत ही रूहानी और रोमांचक साहित्यक पत्रिका से किसी भी प्रकार कम नहीं है. अखबार में सामाजिक ख़बरों के साथ साथ साहित्य गतिविधियों को यथावत स्थान देना और पाठकों की रूचि बनाये रखना बेहद ही कठिन और चुनोतिपूर्ण कार्य है. आज उत्कर्ष मेल अनेक रचनाकारों के लिए अभिव्यक्ति का बेहद शशक्त स्रोत बन गया है. एक से एक अनूठी रचनाएँ और अन्य मनोरंजन की सार्थक सामग्री से परिपूर्ण उत्कर्ष मेल अपने आप में एक पठनीय और सराहनीय समाचार पत्र बन गया है, जिसका मुझे बेसब्री से इंतज़ार रहता है.

आज की कठिन पर्तिस्पर्धा के युग में जहां समाचरपत्र और पत्रिकाओं को अपना अस्तित्व कायम रखने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता है, ऐसे में उत्कर्ष मेल की बेहद ही अनूठी और रोमांचक प्रस्तुती के कारण अपना गौरव कायम है , संपादक जी का साहित्य के प्रति उनकी आस्था और निस्वार्थ समपर्ण को मेरा सलाम .
आदरणीय संपादक जी और उनकी पूरी टीम को हार्दिक बधाई इतनी शानदार पेशकश पर. नये पुराने रचनाकारों से परिचय कराने और उनसे जुडी विस्तृत जानकारी देने में आप सभी का ये प्रयास अत्यंत सराहनीय है. उत्कर्ष मेल दिन बा दिन उचाईयों के नये आयाम स्थापित करे इन्ही शुभकामनाओ के साथ ..

दीप मल्लिका दीपावली -समस्त देशवासियों के लिए सुख, समृद्धि, शांति व धन-वैभव दायक हो॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰ इसी कामना के साथ॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰ दीपावली की हार्दिक शुभकामनाए.."

"शिकवे ,गिले ,शिकायतें सब भूल जाएँ हम ,
कुछ इस तरह से प्यार के दीपक जलाएं हम"
 —

Saturday, November 9, 2013

"हथेली पे उतारा हमने" published in "SAADAR INDIA" Oct 2013

Nazm Published in "SAADAR INDIA" Oct 2013 

"हथेली पे उतारा हमने" 

रात भर चाँद को चुपके से 
हथेली पे उतारा हमने 
कभी माथे पे टिकाया 
कभी कंगन पे सजाया 
आँचल में टांक के मौसम की तरह 
अपने अक्स को संवारा हमने 

रात भर चाँद को चुपके से 
हथेली पे उतारा हमने 
सुना उसकी तन्हाई का सबब 
कही अपनी दास्तान भी 
तेरे होटों की जुम्बिश की तरह 
पहरों दिया सहारा हमने 

रात भर चाँद को चुपके से 
हथेली पे उतारा हमने 
अपने अश्को से बनाके 
मोहब्बत का हँसीं ताजमहल 
तेरी यादों की करवटों की तरह 
यूँ हीं एक टक निहारा हमने 

रात भर चाँद को चुपके से 
हथेली पे उतारा हमने 

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Raat bhar chaand ko chupke se
Hatheli pe utara humne, 
kabhi mathe pe tikaya,
kabhi kangan pe sajaya
AaNchal meiN taaNk ke mausam ki tarah,
apne aks ko saNwara humne

Raat bhar chaand ko chupke se
Hatheli pe utara humne
suna uski tanhayi ka sabab,
kahi apni daastaan bhi,
tere honthoN ki jumbish ki tarah,
pehroN diya sahara humne

Raat bhar chaand ko chupke se
Hatheli pe utara humne
apne ashkoN se banake ,
Mohabbat ka haNsi Tajmahal
teri yaadoN ki karwatoN ki tarah
YuNhi ek tak nihara humne
Raat bhar chaand ko chupke se
Hatheli pe utara humne-

Monday, October 28, 2013

SEEMA GUPTA KI EK GHAZAL KA ADBI JAIZA BY DR. RAHAT MAZAHIRI Published in " AZIZULHIND" FROM DELHI.

SEEMA GUPTA KI EK GHAZAL KA ADBI JAIZA BY DR. RAHAT MAZAHIRI is being Published today i.e 28th Oct 2013 Monday  in a leading Urdu news paper " AZIZULHIND" FROM DELHI.

Sunday, October 27, 2013

Literary Review of My Poetry/ Ghazals published today i.e 27th Oct 2013 in a leading Urdu news paper " AZIZULHIND" Delhi

A Beautiful Literary Review of My Poetry/ Ghazals is being published today i.e 27th Oct 2013 in a leading Urdu news paper " AZIZULHIND" FROM DELHI  by Aslam Chishti ji along with other Poets .

Thursday, October 24, 2013

नज़्म --------- "अश्को के घुंघरू "

Poetry Published in Literary Magazine "DAWAT_O_TABLEEGH (Delhi), Edition- OCT_DEC 2013
नज़्म 
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"अश्को के घुंघरू "

धडकनों के अनगिनत जुगनू
कहाँ सब्र से काम लेते हैं
चारो पहर खुद से उलझते हैं
तेरे ही किस्से तमाम होते हैं
लम्हा लम्हा तुझको दोहराना
यही एक काम उल्फत का
हवाओं के परो पर लिखे
इनके पैगाम होते हो
कभी बेदारियां खुद से
कभी शिकवे शिकायत भी
तेरी यादो की शबनम में
मेरे अश्को के सब घुंघरू
तबाह सुबह शाम होते हैं
धडकनों के अनगिनत जुगनू
कहाँ सब्र से काम लेते...

Monday, October 7, 2013

"नर्म लिहाफ़" Poetry Published in 'अनहद कृति" (September 2013 )

"नर्म लिहाफ़"

नर्म लिहाफ़
--------------
सियाह रात का एक क़तरा जब
आँखों के बेचैन दरिया की
कशमकश से उलझने लगा,
बस वही एक शख्स अचानक
मेरे सिराहने पे मुझसे आ के मिला|

मैं ठिठक कर उसके एहसास को
छूती टटोलती आँचल में छुपा
रूह के तहख़ाने में, सहेज लेती हूँ
कुछ हसरतें नर्म लिहाफ़ में
डूबके मचलने लगती हैं,
जब वही एक शख्स अचानक
मेरे सिराहने पे मुझसे आ के मिला|

कुछ मजबूरियों की पगडंडियाँ
जो मेरे शाने पे उभर आती हैं,
अपने ही यक़ीन के स्पर्श की
सुगबुगाहट से हट,
चाँद के साथ मेरी हथेलियों में
चुपके-चुपके से सिमटने लगती हैं,
सच वही बस वही एक शख्स जब अचानक
मेरे सिराहने पे मुझसे आ के मिला।


Friday, June 14, 2013

''हस्तक्षेप '' में मेरी ग़ज़ल और नज़्म

Poetry Published in " Hastkshep" May 2013. 
मई 2013 के प्रवेशांक ''हस्तक्षेप '' में  मेरी ग़ज़ल और नज़्म को  स्थान मिला .  सम्पादक जी का दिल से शुक्रिया 

नज़्म 
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ऐ जाने  -जहां  ...
है तेरा ही ख्याल 
तु मेरा शोक़ है कहाँ 
तेरा शोके- तमाशा हूँ मैं 
मेरे ज़ब्त का मुदावा है तु मगर   
दश्ते  -दिल में उतर आई है 
फ़िराक के लम्हों की रौनकें कितनी   
इक आलमे - बेक़रारी में 
निगाह गाफ़िल है तुझसे  
मुझ   में तुझ से   खुलते तो है 
मजबूर तकाजों के दरीचे लेकिन 
अब मैं हूँ तुझ से वाबसता 
मेरी तन्हाई है 
भीगी हुई रात का फूसुं है हर सू 
लरजते रहते हैं मेरी पलकों पर 
तेरी याद के शबनमी मोती 
ऐ जाने  -जहां  ...

.

 NAZM
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E- jaane- JahaN......
 hai tera hi khyaal 
tu mera shouq hai kahan 
tera Shoq-e-tamaasha hun main
Mere zabt ka mudaava hai tu magar  
Dasht-E-Dil Mein utar aaye hai 
Firaaq Lamho'n ki ronake'n kitni 
ek aalme- beqarari mein
nigah  gaafil hai tujse....
mujh main tujh se khulte toh hai 
Majboor Taqazo'n ke dreeche  lekin
ab mein hun tujh se vabstaa
meri tanhai hai
bheegi hui raat ka fusu'n hai har su
larjte rehte hain meri palkon par
teri yaad ke shabnmi moti
 E- jaane- JahaN......

Saturday, June 1, 2013

Poetry Published in a one of famous literary magazine ""Hindi Pushp" from Australia victoria" June2013 edition

"झील को दर्पण बना"

रात के स्वर्णिम पहर में
झील को दर्पण बना
चाँद जब बादलो से निकल
श्रृंगार करता होगा
चांदनी का ओढ़ आँचल
धरा भी इतराती तो होगी...

मस्त पवन की अंगडाई
दरख्तों के झुरमुट में छिप कर
परिधान बदल बदल
मन को गुदगुदाती तो होगी.....

नदिया पुरे वेग मे बह
किनारों से टकरा टकरा
दीवाने दिल के धड़कने का
सबब सुनाती तो होगी .....

खामोशी की आगोश मे रात
जब पहरों में ढलती होगी
ओस की बूँदें दूब के बदन पे
फिसल लजाती तो होगी ......

दूर बजती किसी बंसी की धुन
पायल की रुनझुन और सरगम
अनजानी सी कोई आहट आकर
तुम्हे मेरी याद दिलाती तो होगी.....

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"jheel ko darpan bnaa'"

raat ke swarnim pahar me'n
jheel ko darpan bnaa
chand jaab badlo'n se nikal
shrangaar karta hoga
chandni ka odh anchal
dhra bhi itraati toh hogi.....
  
mast pavan ki angdaai
drakhto'n ke jhurmut me'n chup kar
paridhan badal badal 
maan ko gudgudati toh hogi......
  
nadiya pure veg me'n beh
kinaor'n se takra takra
diwane dil ke dhrkne kaa
sabab sunati toh hogi.......
  
khamoshi ki aagosh me raat
jab pahro'n me'n dhalti hogi
oos ki bunde'n dub ke badan pe
fisal lajati toh hogi........
  
dur bajti kisi bansi ki dhun
payal runjhun or sargam
anjaani si koi aahat aakar

tumhe meri yaad dilati toh hogi......